दिल बिखरसा जाता है !
अपनीही चेतना जैसे
प्रकाश की किरणे बिखेरती है !
प्रकाश की किरणे बिखेरती है !
कुछ उदासी छा जाती है !
अपने दिलसे फिर कोई सोयी हुई उम्मीद
तुम्हारी परछायी बनकर
जीने को मजबूर करती है !
तुम्हारी परछायी बनकर
जीने को मजबूर करती है !
जाने ऐसा क्यू लगता है की मैं
अपने कृष्ण के पास खींची जा रही हूँ !
अपने कृष्ण के पास खींची जा रही हूँ !
पर क्या पता ये मेरे अंदरसे बाहर कब आयेगा ?
सोचती हूँ खूब सारीं किताबें
अपने अंदर सिंच लू पर पुरी पढ़ ही नहीं पाती....
अपने अंदर सिंच लू पर पुरी पढ़ ही नहीं पाती....
हर एक शब्दमें मुझे तुम नजर आते हो !
शायद मेरे अंदर की चेतना
या फिर जीने का वजूद है ये कृष्ण ...
समझ नहीं पाती मैं .......
कई बार तूम ख्वाबोमे आये !
कई बार तूम ख्वाबोमे आये !
मेरे रूहसे आत्मा तक समाये !
तो रोज रोज की सपनोकी आँखमिचोलि
मैंने तुमसे मिलकर रोक ली !
मैंने तुमसे मिलकर रोक ली !
पर तुमको लबौमे बता नहीं पायी !
ये भी शायद तुम्हे सच ना लगे ! कोई बात नहीं !
पर कही कही कृष्ण मिल रहा है !
*- आरती*

1 comment:
सुंदर रचना !!!!!
Post a Comment