Monday, July 23, 2018

कृष्ण







जब भी अपने अंदरकी आवाज सुनती हूँ ... 
दिल बिखरसा जाता है ! 
अपनीही चेतना जैसे 
प्रकाश की किरणे बिखेरती है !

 कुछ उदासी छा जाती है !
अपने दिलसे फिर कोई सोयी हुई उम्मीद 
तुम्हारी परछायी बनकर 
जीने को मजबूर करती है !
जाने ऐसा क्यू लगता है की मैं 
अपने कृष्ण के पास खींची जा रही हूँ !

पर क्या पता ये मेरे अंदरसे बाहर कब आयेगा ?
सोचती हूँ खूब सारीं किताबें 
अपने अंदर सिंच लू पर पुरी पढ़ ही नहीं पाती.... 
हर एक शब्दमें मुझे तुम नजर आते हो ! 

 शायद मेरे अंदर की चेतना
या फिर जीने का वजूद है ये कृष्ण ...

समझ नहीं पाती मैं ....... 
कई बार तूम ख्वाबोमे आये ! 
मेरे रूहसे आत्मा तक समाये !
तो रोज रोज की सपनोकी आँखमिचोलि 
मैंने तुमसे मिलकर रोक ली ! 
पर तुमको लबौमे बता नहीं पायी !

ये भी शायद तुम्हे सच ना लगे ! कोई बात नहीं ! 
पर कही कही कृष्ण मिल रहा है !

               *- आरती*





 कुठे गेल्या या टॉपर मुली ?                             माझ्या एका मैत्रिणीचे जेव्हा नुकतेच लग्न झाले होते तेव्हा तिचे आणि तिच्या पतीचे कामा...